Wednesday, July 29, 2020

Rakhi Stories: इस तरह शुरू हुआ रक्षाबंधन का त्योहार

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रक्षाबंदन एक हिन्दू और मुस्लिम त्योहार है, जो हर वर्ष पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. सावन में मनाये जाने के कारन ऐसे सावनी भी कहा जाता है. रक्षाबंदन भाई बहन का प्रसिद्ध त्यौहार है. रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंदन का मतलब बाध्य है. इस दिन बहने भगवन से अपने भाईओं के लिए तरक्की एवं खुशलता मांगती है. वैसे भारी संख्या में  राखी भाई बहन का ही रिश्ता है परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं छोटी लड़कियों जैसे पुत्री द्वारा पिता को भी बाँधी जाती है.

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रक्षाबंदन का इतिहास(राजा बलि और लक्ष्मी मां ने शुरू की भाई-बहन की राखी)-

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जैसे की रक्षा बंदन का त्योंहार आज पुरे देश मैं धूम धाम से मनाया जाता है. राजा बलि और लक्ष्मी मां ने शुरू की भाई-बहन की राखी जैसे की हम सब को पता है के राजा बलि बुहत दानी राजा थे, और भगवन विष्णु जी के भगत थे. एक बार भगवन विष्णु जी ने यज्ञ किया और राजा बली की परीक्षा लेने के लिए तीन पग भूमि देने के लिए कहा. मगर भगवन विष्णु जी ने 2 पग में ही सारी भूमि और आकाश नाप लिया था. इस पर राजा बलि समज गए थे के इस में भगवन जी परीक्षा ले रहे है इस लिए तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपने सिर पर भगवन जी का पग रखवा लिया। और फर उन्होने भगवन विष्णु जी से बिनती करी के अब मेरा सब कुछ तो चला गया और भगवन विष्णु जी को सव्य पाताल में चल कर रहने की प्राथना करी. भगवान जी ने बात मान ली और पाताल में चल कर रहने लगे उदर लक्ष्मी देवी परेशान हो गयी फिर उन्होने लीला रची और गरीब औरत बन कर राजा बलि के पास गयी और राजा को राखी बांध दी तो इस पर राजा ने बोला के मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है. इस पर देवी लक्ष्मी अपने रूप में आ गईं और कहने लगी के आपके पास तो भगवान है बस मुझे वो चाहिए में उने लेने आयी हूँ. इस पर राजा को उनकी बात माननी पड़ी इस तरह भगवान चार महीने पाताल में भी रुकने का वरदान दे कर गए.

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द्रौपदी और कृष्ण का रक्षाबंधन- राखी से जुडी एक और बुहत भावुक कथा है जो के हमारे इतिहास से बुहत गहरी जुडी होइ है. ये कथा कुछ इस प्रकार है के युधिष्ठिर यज्ञ में शिशुपाल भी मजूद थे और उसी समय शिशुपाल ने भगवन कृष्ण जी का अपमान करा और कृष्ण जी ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। वापिस आते सुदर्शन चक्र से भगवान कृष्ण छोटी उंगली कट गयी. और इस तरह काफी रक्त बहने लगा और जे सब देख क्र द्रोपती ने अपने साड़ी का पलो फाड़ कर कृष्ण जी की उंगली लपेट दी. इस के बाद जब कौरवों ने द्रोपती का चीरहरण करने की कोशिश करी तो भगवान ने वहां आकर द्रोपती के चीर लाज राखी इस तरह सुन ने में आता द्रोपती ने भगवान कृष्ण जी के पलो बांधा वह भी पूर्णिमा का दिन था.

 


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